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शिक्षकों को बदनाम यही सोशल मीडिया का काम

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      आये दिनों सोशल मीडिया में खास कर बिहार के शिक्षकों को खूब नीचा दिखाया जा रहा है। जितना ज्यादा नीच दिखायेंगे उनका उतना ही रीच होगा और अपने आप को गुड फील महसूस करेंगे। पापी,गुण्डा,हरामी,गन्दा, हीटलर, इश्कबाज ,चोर, राक्षस आदि-आदि अनेक निकृष्ट अलंकरणों से अलंकृत किया जा रहा है। कुछ अतत्वों के कारण पुरे शिक्षक समाज को नीचा दिखाया जा रहा है।  ये चल क्या रहा है? हम सभी शिक्षक मुकदर्शक होकर मोबाइल स्क्रीन पर देख कर धृतराष्ट्र की सभा में बैठे चीरहरण को देख भीष्म पितामह की तरह रह जा रहे हैं।                                  कुछ दिन पहले बक्सर जिले के मध्य विद्यालय की घटना से हम सभी अवगत हैं। कुछ विद्यालयों में अशिक्षकों द्वारा अशोभनीय कृत कर "शिक्षक" जैसे प्रतिष्ठित शब्द को अपशब्द का रूप बनाया जा रहा है। यह समाज के लिए सही नहीं है।कुछ असारों के कारण सार को तार तार कर‌ देना ये सोशल मीडिया धुरंधरों की गलत फहमी है।                 साहब! म...

ससुराल सोआगत

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बहुत दिन के बाद जब गेली हम ससुराल। सास ससुर के गोड़ लागली पुछलन हालचाल।। साली अयलन पीछे से धरले झारी परात। पांव लागके मोजा खोललन धोयलन गोड़ हाथ।। तनिक देर के बाद फिर लओलन बड़ियां नस्ता। दु समौसा गड़ी छुहारा बिस्कुट मिकचर खस्ता।। खाते खाते चाय ले अयलन बड़का कप उसाह। नस्ता चाय मजे से करके कहली वाह वाह।। ई कहईते समय न बितले, फिर आगेल भरल थारी। आलू बइगन लऊका गोभी पकौड़ी भभरा भारी।। हम कहली कि अब न चलतो, तब हंँस के बोललन साली। का जीजा जी काहे सरमाईत हऽ पेट रहतो फिर खाली।। खाली नस्ता चाय पी के बोल देलऽ तू बऽस । एतना तूहूं का लजाईत हऽ पकौड़ी खा धका-धक।। सास भी सुन के पास अयलन, काहे बाबू हऽ कम खाईत। अप्पन हिओ न लजा काहे हऽ सरमाईत।। का करी हम समझ न आवे फिर लगौली जोर। पेट कहे कि शांत हो जा,कहीं अभी न हो जाए भोर।। हमुहूं सोंचली पेट हे ई न की बड़का पिटार। हाथ रोकली पानी पीली लेली लम्बा ढेकार।। किस्सा-कहानी होबे लगलन इधर -उधर के बात। पेट भारी से हम लाचारी का करी संवाद।। आउ चार गो हंसते अयलन पहुना हथी किधर । का पहुना बड़ी दिन पर अयलऽ बोलते अयलन भितर ।। ठोकली माथा मन ही मन फिर हंसली करली धीरे बात। सा...

अगलगी से बचाव

  आ रही है गर्मी  लू तपीस होत  बेजोड़ जी । आग के ये यार है बचाव से करो गठजोड़ जी ।। जब भी आग लग जाए तो करें नहीं हम भागम भाग। "रूको लेटो लुढ़को" मूल मंत्र है उपचार जान ।। पानी बालू भीगा कंबल और अग्निशमन यंत्र। डायल एक सौ एक पर और सहयोगी सरकारी तंत्र।। घर बनाएं ,बना हुआ है रखें हवादार जी । खिड़की चौड़ी दरवाजा सब रहे खुलादार जी ।। बिजली रानी बड़ी भयानी यदि खुला तार है । सही तरह जो रखे सुरक्षित वही समझदार है ।। जहां-तहां न माचिस तिल्ली आग जला कर फेंके । दीया चूल्हा गैस रसोई रात लाईट ऑन न छोड़ें ।। जहां तक संभव हो गर्मी में सुबह नौ रसोई। शाम भी छः बजे जरुरी अगलगी न होई ।। हम सभी इन बातों को मानें रहेंगे सदा सुरक्षित । मिले पका भोजन अनुकूल आग करें सदा रक्षित ।। - गोपाल पाठक 
 भाषा है नदी की धार तरह,  वह अविरल चंचल हिन्दी । है सरल प्रवृति और प्रकृति,  भारत माँ की बिन्दी । नहीं खाश जाति मजहब का,  नहीं अधिकार किसी का । नहीं है कोई क्रय विक्रय की, भाषा हिन्दी सभी का । है व्यापक सर्वत्र विशिष्ठ में,  एकता की है भाषा । समृद्ध है यह हर्षित है,  निकले कई हैं शाखा । ब्रजभाषा ,कन्नौजी ,मगही, अवधी या बुंदेली । राजस्थानी या गढ़वाली,  सब हिन्दी की बोली । यह नहीं शिर्फ उत्तर दिशी की,  बल्कि दक्षिण पश्चिम । पूर्वी या पूर्वोत्तर भारत,  नहीं है इसकी अंतिम । दक्षिण के आचार्य वल्लभा, रामानुज विट्ठल रामानंद। पश्चिम नरसी नाम ज्ञानेश्वर, पूर्वी महाप्रभु चैतन्य। ऐसे संत कवि अनेक है, सीमित नहीं, नहीं है अंत। वर्तमान के अंचल में भी, हिंदी शोभित भविष्य अनंत।            - गोपाल पाठक 

विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस

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 जन्म दिया हूँ पता नहीं रहेगा मेरे पास। वर्तमान तो देख रहा भविष्य की नहीं आश।। आज उत्सव कल महोत्सव या होगा उपहास । विधि विधाता सब कुछ जाने निज सुत सुता परिभाष।। कहने को तो बेटा बेटी बहु सुन्दर परिवार। कल का कोई भरोसा नहीं है कौन होगा दुराचार ?? तीन-तीन चार दश सदस्य कुशल भरा परिवार । भले आज आनंद हो कल कौन खेवनहार ??                              - गोपाल पाठक

अर्थ ही अर्थ है

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आजादी का पचहत्तर वर्ष  और हर घर तिरंगा राष्ट्रवाद का बह रहा है यमुना गंगा पर‌ यमुना गंगा निर्मल है!  स्वच्छ है! या दिल्ली कानपुर जैसा  यह प्रश्न है । डुबकी लगाऊं या हाथ जोड़ लूं "आस्था के कुंभ में डुबकी धर्म है" सरकार रूपी संत का यही कथन है। हे संत !  यह दिखावा तो नहीं आपका छलावा तो नहीं  आप धर्म और कर्तव्य से विमुख हैं कह रहा हूं यह कटू  परन्तु ; परम सत्य है। कैसा उत्सव अमृत महोत्सव  सुनो ; यदि कान है! पचहत्तर वर्ष हो गये झोपड़ी में भी नहीं सड़क पर  भूखे आज चित्कार है  नौजवान वेरोजगार है ,  महंगाई कमरतोड़ मार है  और आपकी कथन इनके लिए नहीं , यह कैसा व्यवहार है । राजनीति की चासनी में मिठास तिरंगा तले! नहीं! तिरंगा आन-वान-शान के प्रतिक है देश का स्वाभिमान है आप कहें या ना कहें  तिरंगा हर देशवासियों के अरमान है। देश की आजादी की आहुति में अपने प्राणों के आहूत करने वाले सर्वस्व समर्पण करने वाले परमवीर योद्धाओं के आत्मा की शांति तेरह से पंद्रह अगस्त तक केवल हर घर तिरंगा से नहीं ! शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार से है शांति सद्भाव से है यही ह...

मगही हमर मातृभाषा.....

 मगही हमर मातृभाषा एकरे से हम सिखली । लईका से अब बड़ा होके असल जवानी पईली।। मईया बाबुजी सबसे पहिले मगही भाषा बोलयलन । हिन्दी अउ अँगरेजी बोलिया सब मगहीये में सुनयलन ।। स्कूलवा में भी मास्टर साहेब मगहीया में पढ़यलन । भले हिन्दी कितबबा में पढ़ मगही में समझयलन ।। चॉक हई अँगरेजी लेकिन चॉकबा लाओ रे लईकन । डस्टर के डस्टरवा कहके अनुवाद असानी कयलन ।। लोग सब पहिले मगही के गाँव गंवार बतयलन । एही से अभी भी कुछ अइसन हथ बोले में सरमयलन ।। तनि जानल बड़कन भईया दीदी मगही भाषा । छोटकन के तू मत भड़काब पुरखन धरले आशा ।। मगध क्षेत्र के मगही संस्कृति सब मिलकर बढ़ाब । देश विदेश में ई भाषा के नया रूप देखाब ।।                      *****                               © गोपाल पाठक  #मातृभाषा_दिवस

ऋतुराज बसंत आगमन.....

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 नव उमंग नव रंग छटाएं नव यौवन में प्रकृति । ललित कलित वन बाग मनोहर हर पल दिखता हर्षित ।। ठंडी ठिठुरन कांपती धरती अब ली है अंगड़ाई । नीला अम्बर धरा पीताम्बर प्रेमी मन बहकाई ।। मंद मंद मदमस्त हवाएं गुन गुन धुप सुहानी । ऋतुराज बसंत आगमन मन हो चला मनमानी ।। नील पीत हरीत बहुरंगी सुषमा चहुँ दिश छायी । नव पल्लव ले तरू लताएं मादकता अधिकायी ।। जूही चम्पा बेली गेन्दा सरसों खेत में भाये । तिसी फूल गगन उतरे तल स्वर्ग मही बन जाए।। कलरव करते मधुर ध्वनि में पंक्षी डाली-डाली । तितली छम-छम भौंरें गूंजन बगिया क्यारी-क्यारी ।। ताल तलैया हंसते पंकज मञ्जरी आम बौराये । शुभ शुभ मंगल नित हो नूतन गुलशन गुल महकाये ।।                              © गोपाल पाठक

घमासान

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 सूर्य मकर में हो प्रवेश तो होगा घमासान । थाली होगा समर भूमि पर तीर नहीं कमान ।। चूड़ा ,दही , गुड़ , तिलकुट सब, हष्ट पुष्ट बलवान । जिह्वा भाग्य विधाता बन कर ,कहेगा कौन महान ।। परिचय सभी अकड़ कर  देगा ,सुनो कान इंसान । भूत काल से वर्तमान तक ,कैसा हैं खानदान ।। चूड़ा खेत देश से आ कर ,फेरे मूंछ पर शान । परम धन्य *श्री धान बहादुर*,हम उनके संतान ।। दही महाशय हांडी क्षेत्र से ,दूध पुत्र से जान । जोर प्रहार चूड़ा पर होगा ,मचेगा घोर संग्राम ।। ईख वंश के परम प्रतापी , गुड़ वीर चट्टान । सबसे ऊपर चढ़कर गरजे ,ठोके सीना तान ।। तीलकुट युवराज बलशाली ,सुनो सभी सावधान । मसका लाई जिसके हो बाजु ,होगा घोर कोहराम ।। चार चतुर मद चूर एक साथ , युद्ध होगा आह्वान । पेठ हाथ फेर भूख काल हो , आदमी बन भगवान ।। सबहि नचावत रामु गोसाईं ,थाली हाथ इंसान । स्वाद परम बनकर बलवाना ,विजय पताका मान ।।                                 - गोपाल पाठक

बेटा कैसी है तैयारी जरा बतला दो..

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बेटा कैसी है तैयारी जरा बतला दो । मैं आ रहीं हूँ द्वारी तेरी दिखला दो ।। मेरी सुनो कान अपील काम करो सब मील  सुरक्षा न हो  ढील  रखना चहुँ दिश सलील जरा बतला दो । मैं आ रहीं हूँ द्वारी तेरी दिखला दो । कोरोना है बड़ा शैतान, पर रहना तू सावधान, मुख मास्क रहे ध्यान, होगा सदा कल्याण, जरा बतला दो । मैं आ रहीं हूँ द्वारी तेरी दिखला दो ।। प्लास्टिक का न प्रयोग,  पानी का न दुरूपयोग,  पैसा का सदुपयोग,  गरीबों को मिले भोग,  जरा बतला दो । मैं आ रहीं हूँ द्वारी तेरी दिखला दो ।। ज्यादा शोर न शराब,  असामाजिक न भड़काव, इधर उधर न पेशाब, कचड़ा का रख रखाब, जरा बतला दो । मैं आ रहीं हूँ द्वारी तेरी दिखला दो ।। जब मेला हो प्रारंभ,  कोई करे न हूड़दंग,  डाले रंग में न भंग,  जब घूमें साथी संग,  जरा बतला दो । मैं आ रहीं हूँ द्वारी तेरी दिखला दो ।।                            - गोपाल पाठक                            ...

दीन दरिद्र पहाड़

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 देख सखी मुस्कान छवि नित  अधरों पे कुछ धार । तेज चमकता मुख की शोभा  भले नहीं गलेहार । फटे बसन तन मैल पड़े हैं  नहीं कोई परवाह । हँसी की छटा घटा पटा है  नहीं विलास की चाह । भुज विशाल है कंचन शोभा , भूख मरूँ क्या मार ? लाल सलोने आंगन रूदन  सुनूँ कैसे चीत्कार  ? घर घूँघट की लाज बड़ी या भूख गरीबी मार । नारी हूँ नर की शक्ति मैं , अबला बन नहीं हार । सर पे भार सहज ही लगता , दीन दरिद्र पहाड़ । धूल बदन हो मन नहीं व्याकुल , जेठ दुपहरिया ठाड़ । कहूँ कहाँ मैं रोऊँ बताऊँ , किसके सामने हाथ । कर्म हीनता रोग व्याधि , बन बैठे जो अनाथ । चलो चलें अपने को साधें  जो साध्य हो साध । निबल नहीं हैं सबल सभी हैं  पग धर बड़ो अबाध ।                  - गोपाल पाठक                         

माँ !

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 क्या शक्ति है ! कितनी धनी है ! हर विपरीत में माँ सबसे तनी है । चिथड़े वसन लिपटे हो तन । माँ की आंचल मखमली हर छण । सुखी रोटियाँ नमक भात ,  ली हो माँ अपनी हाथ । पर वह मखन मलाई से कम नहीं , खिलाई हो कोर बांध । तपती चिलचिलाती जेठ की दुपहरी । माँ साथ रहती देती छाया बन कर प्रहरी । वह कड़कड़ाती हाड़ कपाती ठंडी !  पुस माघ की । छाती में चिपका बिन ऊनी वस्त्र माँ ,  लड़ती बाघ सी । हर स्वप्न हर ख्वाहिशें पुरा करने को , जोर लगा देती । नहीं है सामर्थ्य पर चमकता तारा सा , माँ सुन्दर बना देती । हर दुख कष्ट समस्या का हँसते समाधान । माँ सच में तू दुनिया में हर शख्सियत से हो महान ।।                                  - गोपाल पाठक 

सुन लो मेरी पुकार......

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सुन लो मेरी पुकार ! कोई सुन लो मेरी पुकार !! थी कली मैं पिता के आंगन,  अब हूँ मैं ससुराल । रोज दंश यहाँ सहना पड़ता , सदा मिलती फटकार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... बचपन मेरा खेल में गुजरा,  मिलता था घर में प्यार । भाई बहन संग होती ठिठोली,  अब होता तिरस्कार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... हुई जवाँ मैं घर में बड़ी थी,  चर्चा चली विवाह । पिता जी मेरे घर से निकले,  करने वर व्यापार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... कठिन परिश्रम कर एक मिला,  पति परमेश्वर भगवान । पिता हमारे धन कुछ देकर,  कर दिये मुझको दान । कर्मभूमि  को जब मैं आयी,  थोड़ा दिन मिला मान । हुआ आरंभ अब कठोर बचन का,  हर छण ही अपमान । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... समझ नहीं मैं पायी थी,  क्यों मिल रहा अपमान । क्या कमियाँ है मुझमें ऐसी, शुरू हो गया मार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... एक दिन ऐसा समय आ गया,  मिला मुझे जवाब । बाप तेरा नहीं धन दिया है,  क्या करूँ सत्कार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... हे कुलक्षिणी कुलघातनी ! छोड़ यहाँ दरबार । जाओ अपने माई के घर तू...

नेता के वश में है जनता....

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 [ तर्ज -: भगत के बस में हैं भगवान  ] नेता के वश में है जनता  गरीब दुखी बेरोजगार शोषित रहे यही शोभित सुन्दरता ! नेता के वश में है जनता !! नेता सीधी जनता की , रोज गाँव में डोले  जनता को भोली समझे , जनता से आदर बोले कभी वो आता नहीं था, आया चुनाव की बारी  हाथ जोड़े चल आगे , चुनाव तक रहता जारी  भले नहीं कोई काम नाम हो, सब कुछ रहे पता ! नेता के वश में है जनता !! देख नेता की माया , चुनाव जब सर पे आया  आता अब रोजे दर पर , बात कुछ कह भरमाया  तेरा मैं ख्याल रखूँगा ,मरते दम जनता में रहूँगा  वोट हमहीं को देना , तेरा सब काम करूँगा  बड़े बड़े बड़ बोल बोल के , जीतते लापता !  नेता के वश में है जनता !!  जीत कर आता नहीं है , प्रित जनता से नहीं है  कुर्सी से चिपके रहता , कोई परवाह नहीं है  शान शोहरत के आगे , गाड़ी बंगला को पावे कौन जनता को देखे , दुबारा कभी न आवे इस तरह के नेताओं को कैसे हम जीता ? नेता के वश में है जनता !!            -::-                   ...

गणेश वंदना

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   हे गौरी पुत्र गणेश गणपति आओ मैं पूजन करूँ ।    दूँ पान अक्षत फूल चंदन और नीराजन करूँ ।।    तू विघ्ननाशक बुद्धिदाता विद्या मंगल दाता हो ।    प्रभु जो भी आये शरण तेरे वो कृपा फल पाता हो।।   हे नाथ आप अनाथ के तू ख्याल नित ही करते हो ।  जो भक्ति से पूजन करे उसे शक्ति धन धान्य देते हो ।।   हूँ अल्प बुद्धि न्यून शुद्धि कपट छल लोभी भरा ।     नित पाप हो निज कर्म से पूजन को नहीं कभी मन करा।।   प्रभु है सुअवसर सुखद दिन एकदंत आप पधारो घर ।  कर जोड़ कर यही विनती सुन टेर अब कष्टों को हर ।।                                   --::--                                         © गोपाल पाठक 

जनता जनार्दन !

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 जनता जनार्दन!  समझे...?  नहीं.... ? ईश्वर ! भगवान ! ... यानि ;  हम जनता महान ! हाँ!  शब्द सुनो कान  और मने में रहो खुश ; कहना हम जनता महान ! भले रहना अंजान  मूंछ पर हाथ, कहीं भटके न ध्यान ! खोना न पहचान  गरीब ,धुखी ,बेरोजगार , शोषित होकर सुशोभित अलंकृत नाम भगत के बस में हैं भगवान ! " भगत ! " हाँ ! भगत, भक्त  ..... कौन ...?  नेता ....! नेता भक्त नहीं ;  वो हैं भगवान  करते हैं कल्याण चुनाव पर्व में आते द्वार नर्म में आम जनता को कहते हैं ; तू मेरी जान ! तुम्हारे लिए हर पल कुर्बान  चाहे देना पड़े प्राण सबसे पहले तोहर काम  भैया ! ऐसी बोली कौन बोले ? जो हो सामर्थ्यवान धन के खजान  जिनका न हो लगाम  बाहुबली में नाम जो जिये शान गाड़ी बंगला आलीशान और कितना बतायें  नेता ही हमरे महान!  हे भगवान......!  भगत के बस में हैं भगवान! जनता पक्का शंकर भगवान  एक लोटा पानी पर ही  दे देते वरदान ! जनता मंदिर के मूर्ति  दर पर सर झुकाओ ; मनोकामना पूर्ति ! जनता देवी माँ भोली-भाली  वो कहता ; बस एक बार ...

हरा भरा है राँची प्यारा

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हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा । मनमोहक परिदृश्य है सुन्दर देखो दुनिया सारा ।। कर्क रेखा के पास अवस्थित छोटा नाग से दक्षिण स्वर्णरेखा के तट पर बस कर प्रकृति हर पल हर्षित  तरसे नहीं कोई के जी आओ एक दोबारा हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा ।। आर्द्र उप-उष्णकटिबंधीय गर्मी डाले न डेरा हरियाली कर चंचल चितवन करता नया सबेरा  पर्वत विटप सुखद जलावायु गठबंधन अलग नजारा हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा ।। दशम फौल हूंड्रू जल झरना बड़ा अनमोल रतन है बाबा पहाड़ी देउड़ी मंदिर मनोकामना स्थल है  मन विक्षिप्त को कांके देता नव जीवन उजियारा हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा  शहर हमारा ।। मछलीघर ,चिड़ियाघर, कांके डैम बहुत खूब भावे राजभवन का नक्षत्र वन देख उमंग गगन मन छाये  आओ घाटी वादियों में घूमों झूमों घर परिवारा  हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा ।।                            - गोपाल पाठक

जब चुनाव की बारी है

 ये काल बवंडर कैसा उमड़ा अब तक नहीं कोई रोक सका । सरकारें लाचार दिखती नये बयान से रोज पका ।। हिम्मत धर लो हिम्मत धरलो और कितना हिम्मत कर लूँ  । राजनीति की नये घरौंदे में क्या मैं अब घर कर लूँ ।। अग्नि धधक भूख बन कातिल तू किसमें मद मस्त रहा । चीख पीर तो सुनता नहीं तू गरीबी कोई शब्द रहा ।। सुखी रोटियाँ नमक भात भी मिल जाये वह दिन सुखी । इससे ज्यादा क्या आश है दीन हीन बन बैठ दुखी ।। शिक्षा स्वास्थ्य और गरीबी हटानी मेरी जिम्मेबारी है । इस पर अब तू नहीं बोलना जब चुनाव की बारी है ।।                                       © गोपाल पाठक 

कोटी नमन कोटी नमन वीर जय जवान को

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धाम धन्य वेदी जहाँ आहुति दे प्राण को कोटी नमन कोटी नमन वीर जय जवान को  सूर्य भी सकुचाय वायुदेव रोके वेग को वीर सीना तान दिया दान निज देह को  काल के कला सब भूल देख बलवान को  कोटी नमन कोटी नमन वीर जय जवान को  बौना बन जाय हिमगिरी जिसके सामने  विटप विकराल मौन रहे सदा सामने  जल थल नभ पुण्य पांव पड़े मानता  शौर्य की कहानी कथा धर्म सदा जानता अग्नि की ज्वाल न जला महाप्राण को  कोटी नमन कोटी नमन वीर जय जवान को  स्वाभिमान अरमान बल भीम काय रहे आन वान शान तीन तीर कमान है जय हिंद जय हिंद मुख महामंत्र रहे भारती की रक्षा खड़ा अड़ा हनुमान है  लाल रक्त धार गंगा धार के समान को कोटी नमन कोटी नमन वीर जय जवान को  आंच नहीं आंचल में आये कभी दाग नहीं  जब आये काम पूर्ण आहुति वह प्राण है बाल बाँका करे नहीं भारत में ताके नहीं समिधा पंचतत्व हवन देह का न भान है  कर्ज निज माटी के चुकाये वह महान को कोटी नमन कोटी नमन वीर जय जवान को            ( जहानाबाद अईरा के लवकुश शर्मा जिन्होंने बारममुला में आतंकवादियों के मुठभेड़ में अपन...

भगता काहे न आवत द्वार.....

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भगता काहे न आवत द्वार गौरा जरा बताई द हमका ! काहे मचल रहे हाहाकार गौरा जरा बताई द हमका !! सावन चढ़गईल बीत रहल हे मिलत नहीं जलधार बोल बम नहीं हर हर महादेव शांत पड़ा दरवार  गौरा जरा बताई द हमका भगता काहे न आवत द्वार गौरा जरा बताई द हमका ! काहे मचल रहे हाहाकार गौरा जरा बताई द हमका !! चार छे आठ दस घंटा जो करे रहे इंतजार  सुनसान काहे हो जाला का भगता  नाराज गौरा जरा बताई द हमका भगता काहे न आवत द्वार गौरा जरा बताई द हमका ! काहे मचल रहे हाहाकार गौरा जरा बताई द हमका !! भांग रमाये धुनी रमाये होता था जयकार  बोल काँवरिया शिव के धाम सुने नहीं इसबार  गौरा जरा बताई द हमका भगता काहे न आवत द्वार गौरा जरा बताई द हमका ! काहे मचल रहे हाहाकार गौरा जरा बताई द हमका !! का गंगा के पानी सुख गइल का पथ रोके पहाड़ का भगता पर कष्ट आ गइल आवत न दरवार  गौरा जरा बताई द हमका भगता काहे न आवत द्वार गौरा जरा बताई द हमका ! काहे मचल रहे हाहाकार गौरा जरा बताई द हमका !! का भीर पड़ल हे भारी लगे नहीं मन ध्यान  कउन समस्या आ गेल जाहिल कर रहे व्यवधान  गौरा जरा बताई द हमका भगता काहे न आवत द्वार...