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Showing posts from February 15, 2019

तू लोगे कब संज्ञान ?

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सिंहासन अब तक खामोश  ! सुनी कान माता बेहोश जनता हाथ मचलकर रोष छप्पन ईंची में है दोष । छलक गया सिने में दूध जब आया आंगन में पुत कब तक सोया रहेगा सुत भीड़ खड़ी देख माता पुछ । पलक नहीं नहीं हीलता सर पिता के दृग हुया पत्थर झर झर आँसू बहता निर्झर वह भूमि पटी अश्रु से तर । लालिमा हटी अब मांग से ,सिंदूर हो गया दूर । प्रेम पिया की बात को ,छीन लिया  सब  क्रुर ।। विरह विलाप की वेदना ,संभव नहीं व्याख्यान । हे पंथ प्रधान ! तू  , लोगे  कब  संज्ञान ??       - गोपाल पाठक             भदसेरी

हे अमर जवान !

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शेर बन कैसे सोये हो ? मांद निकल तू बाहर आ । कुत्ते करता रोज गलतियाँ, धड़ से सिर अलग कर आ । बहुत हो चुका नम्र दिखाना, भारत माँ के वीर जवान । दे जबाब अब नहीं सहो तू , जब भी वार करे शैतान । फहरादो लाहौर तिरंगा  , पेशावर नहीं रहे निशान । नाम मिटादो मान चित्र से , वीर सपुत हे अमर जवान ! जय हिन्द ! जय जवान !    - गोपाल पाठक          भदसेरी 

सिंहासन अब भी नहीं डोला

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सिंहासन अब भी नहीं डोला कायर कहने को मन बोला अब तो सेनाओं पर छोड़ो , "कड़ी निंदा करता हूँ " ये मत बोलो कल तो बोल दिये थे आप आज सुनेगा कौन प्रलाप किसी का गोद किसी का मांग सुना किया, सीमा अब लांघ नहीं रोकड़े नहीं ठोकरें हाफीज को तू करो चिथड़े रक्त चंडिका जाग चुकी है खप्पर वाली आ चुकी है नेताओं मत कर व्यापार इसमें खलल नहीं मत डाल       - गोपाल पाठक               भदसेरी