ससुराल सोआगत
बहुत दिन के बाद जब गेली हम ससुराल। सास ससुर के गोड़ लागली पुछलन हालचाल।। साली अयलन पीछे से धरले झारी परात। पांव लागके मोजा खोललन धोयलन गोड़ हाथ।। तनिक देर के बाद फिर लओलन बड़ियां नस्ता। दु समौसा गड़ी छुहारा बिस्कुट मिकचर खस्ता।। खाते खाते चाय ले अयलन बड़का कप उसाह। नस्ता चाय मजे से करके कहली वाह वाह।। ई कहईते समय न बितले, फिर आगेल भरल थारी। आलू बइगन लऊका गोभी पकौड़ी भभरा भारी।। हम कहली कि अब न चलतो, तब हंँस के बोललन साली। का जीजा जी काहे सरमाईत हऽ पेट रहतो फिर खाली।। खाली नस्ता चाय पी के बोल देलऽ तू बऽस । एतना तूहूं का लजाईत हऽ पकौड़ी खा धका-धक।। सास भी सुन के पास अयलन, काहे बाबू हऽ कम खाईत। अप्पन हिओ न लजा काहे हऽ सरमाईत।। का करी हम समझ न आवे फिर लगौली जोर। पेट कहे कि शांत हो जा,कहीं अभी न हो जाए भोर।। हमुहूं सोंचली पेट हे ई न की बड़का पिटार। हाथ रोकली पानी पीली लेली लम्बा ढेकार।। किस्सा-कहानी होबे लगलन इधर -उधर के बात। पेट भारी से हम लाचारी का करी संवाद।। आउ चार गो हंसते अयलन पहुना हथी किधर । का पहुना बड़ी दिन पर अयलऽ बोलते अयलन भितर ।। ठोकली माथा मन ही मन फिर हंसली करली धीरे बात। सा...