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शिक्षकों को बदनाम यही सोशल मीडिया का काम

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      आये दिनों सोशल मीडिया में खास कर बिहार के शिक्षकों को खूब नीचा दिखाया जा रहा है। जितना ज्यादा नीच दिखायेंगे उनका उतना ही रीच होगा और अपने आप को गुड फील महसूस करेंगे। पापी,गुण्डा,हरामी,गन्दा, हीटलर, इश्कबाज ,चोर, राक्षस आदि-आदि अनेक निकृष्ट अलंकरणों से अलंकृत किया जा रहा है। कुछ अतत्वों के कारण पुरे शिक्षक समाज को नीचा दिखाया जा रहा है।  ये चल क्या रहा है? हम सभी शिक्षक मुकदर्शक होकर मोबाइल स्क्रीन पर देख कर धृतराष्ट्र की सभा में बैठे चीरहरण को देख भीष्म पितामह की तरह रह जा रहे हैं।                                  कुछ दिन पहले बक्सर जिले के मध्य विद्यालय की घटना से हम सभी अवगत हैं। कुछ विद्यालयों में अशिक्षकों द्वारा अशोभनीय कृत कर "शिक्षक" जैसे प्रतिष्ठित शब्द को अपशब्द का रूप बनाया जा रहा है। यह समाज के लिए सही नहीं है।कुछ असारों के कारण सार को तार तार कर‌ देना ये सोशल मीडिया धुरंधरों की गलत फहमी है।                 साहब! म...

ससुराल सोआगत

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बहुत दिन के बाद जब गेली हम ससुराल। सास ससुर के गोड़ लागली पुछलन हालचाल।। साली अयलन पीछे से धरले झारी परात। पांव लागके मोजा खोललन धोयलन गोड़ हाथ।। तनिक देर के बाद फिर लओलन बड़ियां नस्ता। दु समौसा गड़ी छुहारा बिस्कुट मिकचर खस्ता।। खाते खाते चाय ले अयलन बड़का कप उसाह। नस्ता चाय मजे से करके कहली वाह वाह।। ई कहईते समय न बितले, फिर आगेल भरल थारी। आलू बइगन लऊका गोभी पकौड़ी भभरा भारी।। हम कहली कि अब न चलतो, तब हंँस के बोललन साली। का जीजा जी काहे सरमाईत हऽ पेट रहतो फिर खाली।। खाली नस्ता चाय पी के बोल देलऽ तू बऽस । एतना तूहूं का लजाईत हऽ पकौड़ी खा धका-धक।। सास भी सुन के पास अयलन, काहे बाबू हऽ कम खाईत। अप्पन हिओ न लजा काहे हऽ सरमाईत।। का करी हम समझ न आवे फिर लगौली जोर। पेट कहे कि शांत हो जा,कहीं अभी न हो जाए भोर।। हमुहूं सोंचली पेट हे ई न की बड़का पिटार। हाथ रोकली पानी पीली लेली लम्बा ढेकार।। किस्सा-कहानी होबे लगलन इधर -उधर के बात। पेट भारी से हम लाचारी का करी संवाद।। आउ चार गो हंसते अयलन पहुना हथी किधर । का पहुना बड़ी दिन पर अयलऽ बोलते अयलन भितर ।। ठोकली माथा मन ही मन फिर हंसली करली धीरे बात। सा...

अगलगी से बचाव

  आ रही है गर्मी  लू तपीस होत  बेजोड़ जी । आग के ये यार है बचाव से करो गठजोड़ जी ।। जब भी आग लग जाए तो करें नहीं हम भागम भाग। "रूको लेटो लुढ़को" मूल मंत्र है उपचार जान ।। पानी बालू भीगा कंबल और अग्निशमन यंत्र। डायल एक सौ एक पर और सहयोगी सरकारी तंत्र।। घर बनाएं ,बना हुआ है रखें हवादार जी । खिड़की चौड़ी दरवाजा सब रहे खुलादार जी ।। बिजली रानी बड़ी भयानी यदि खुला तार है । सही तरह जो रखे सुरक्षित वही समझदार है ।। जहां-तहां न माचिस तिल्ली आग जला कर फेंके । दीया चूल्हा गैस रसोई रात लाईट ऑन न छोड़ें ।। जहां तक संभव हो गर्मी में सुबह नौ रसोई। शाम भी छः बजे जरुरी अगलगी न होई ।। हम सभी इन बातों को मानें रहेंगे सदा सुरक्षित । मिले पका भोजन अनुकूल आग करें सदा रक्षित ।। - गोपाल पाठक 
 भाषा है नदी की धार तरह,  वह अविरल चंचल हिन्दी । है सरल प्रवृति और प्रकृति,  भारत माँ की बिन्दी । नहीं खाश जाति मजहब का,  नहीं अधिकार किसी का । नहीं है कोई क्रय विक्रय की, भाषा हिन्दी सभी का । है व्यापक सर्वत्र विशिष्ठ में,  एकता की है भाषा । समृद्ध है यह हर्षित है,  निकले कई हैं शाखा । ब्रजभाषा ,कन्नौजी ,मगही, अवधी या बुंदेली । राजस्थानी या गढ़वाली,  सब हिन्दी की बोली । यह नहीं शिर्फ उत्तर दिशी की,  बल्कि दक्षिण पश्चिम । पूर्वी या पूर्वोत्तर भारत,  नहीं है इसकी अंतिम । दक्षिण के आचार्य वल्लभा, रामानुज विट्ठल रामानंद। पश्चिम नरसी नाम ज्ञानेश्वर, पूर्वी महाप्रभु चैतन्य। ऐसे संत कवि अनेक है, सीमित नहीं, नहीं है अंत। वर्तमान के अंचल में भी, हिंदी शोभित भविष्य अनंत।            - गोपाल पाठक 

विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस

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 जन्म दिया हूँ पता नहीं रहेगा मेरे पास। वर्तमान तो देख रहा भविष्य की नहीं आश।। आज उत्सव कल महोत्सव या होगा उपहास । विधि विधाता सब कुछ जाने निज सुत सुता परिभाष।। कहने को तो बेटा बेटी बहु सुन्दर परिवार। कल का कोई भरोसा नहीं है कौन होगा दुराचार ?? तीन-तीन चार दश सदस्य कुशल भरा परिवार । भले आज आनंद हो कल कौन खेवनहार ??                              - गोपाल पाठक

अर्थ ही अर्थ है

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आजादी का पचहत्तर वर्ष  और हर घर तिरंगा राष्ट्रवाद का बह रहा है यमुना गंगा पर‌ यमुना गंगा निर्मल है!  स्वच्छ है! या दिल्ली कानपुर जैसा  यह प्रश्न है । डुबकी लगाऊं या हाथ जोड़ लूं "आस्था के कुंभ में डुबकी धर्म है" सरकार रूपी संत का यही कथन है। हे संत !  यह दिखावा तो नहीं आपका छलावा तो नहीं  आप धर्म और कर्तव्य से विमुख हैं कह रहा हूं यह कटू  परन्तु ; परम सत्य है। कैसा उत्सव अमृत महोत्सव  सुनो ; यदि कान है! पचहत्तर वर्ष हो गये झोपड़ी में भी नहीं सड़क पर  भूखे आज चित्कार है  नौजवान वेरोजगार है ,  महंगाई कमरतोड़ मार है  और आपकी कथन इनके लिए नहीं , यह कैसा व्यवहार है । राजनीति की चासनी में मिठास तिरंगा तले! नहीं! तिरंगा आन-वान-शान के प्रतिक है देश का स्वाभिमान है आप कहें या ना कहें  तिरंगा हर देशवासियों के अरमान है। देश की आजादी की आहुति में अपने प्राणों के आहूत करने वाले सर्वस्व समर्पण करने वाले परमवीर योद्धाओं के आत्मा की शांति तेरह से पंद्रह अगस्त तक केवल हर घर तिरंगा से नहीं ! शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार से है शांति सद्भाव से है यही ह...

मगही हमर मातृभाषा.....

 मगही हमर मातृभाषा एकरे से हम सिखली । लईका से अब बड़ा होके असल जवानी पईली।। मईया बाबुजी सबसे पहिले मगही भाषा बोलयलन । हिन्दी अउ अँगरेजी बोलिया सब मगहीये में सुनयलन ।। स्कूलवा में भी मास्टर साहेब मगहीया में पढ़यलन । भले हिन्दी कितबबा में पढ़ मगही में समझयलन ।। चॉक हई अँगरेजी लेकिन चॉकबा लाओ रे लईकन । डस्टर के डस्टरवा कहके अनुवाद असानी कयलन ।। लोग सब पहिले मगही के गाँव गंवार बतयलन । एही से अभी भी कुछ अइसन हथ बोले में सरमयलन ।। तनि जानल बड़कन भईया दीदी मगही भाषा । छोटकन के तू मत भड़काब पुरखन धरले आशा ।। मगध क्षेत्र के मगही संस्कृति सब मिलकर बढ़ाब । देश विदेश में ई भाषा के नया रूप देखाब ।।                      *****                               © गोपाल पाठक  #मातृभाषा_दिवस