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आज का बचपन कल की याद !

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मस्ती जरा करलें छुट्टी में जो आया । चलो देखें उपवन कुसुम खुशबू लाया।। महके बेली चंपा चमेली सुहाया । बेला गेंदा गूलमोहर गुद गुदाया ।। शीत की लरियाँ मोती शाद पर छाया । मिलन शुभ सुबह किरण खूब लुभाया ।। बच्चे  न होश लगे कड़क ठंडी । खेले कूदे वाटिका लगे मंडी ।। झूला झूल फिसल चढ़े कठघोड़ा । चूहा पेट दौड़े हो पानी पकौड़ा ।। जब पों पों आवाज भोपों से आयी । चिलम भर कटोरी खा लें मलाई ।। मा बाप सोंचे बचपन लरकाई । मेरो मातु पितु सुलाये रजाई ।। कुहासा बड़ी ठंड घूमो न बाहर । पीठा रोटी मोटी चोखा से आदर ।। सुबह शाम बीते अंटा गुली डंडा । साथी के संग चूड़ा आलू औंधा ।। गूंड़ चुटार कोलसार मालिक लुटाते । घर दस बीस मित चाटे चाट आते ।। किसका सुखद बचपन लागे सुहाना । पाठक सोंचे मन में की ये वो जमाना ।।                                    © गोपाल पाठक                                       ...