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Showing posts from March 26, 2020

माता जी की स्तुति

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जगत जननी सुनो विनती पूजन स्वीकार कर मेरा। पड़ा भव जाल सिंधु में करो उद्धार अब मेरा । नहीं कोई सहारा है नहीं कोई हमारा है । बस तू हीं हो मैया जो मेरा खेवनहारा है । मति मंद मोह बस मैया नहीं नित ध्यान करता हूँ । लोभी मन पाप हिय बसी जा पूजन से दूर रहता हूँ । नहीं कुछ शुद्धता है माँ अशुद्धता जड़ बना देता । हटूँ मैं दूर अब कैसे माया नूतन बना लेता । सुना हूँ आप की महिमा पुकारे तू चली आती । देती धन-धान्य अरू दौलत भक्ति रस पान करवाती ।। * जय माता दी * ---: समाप्त :--- © गोपाल पाठक