संस्कृत रहे निशानी
असली सभ्यता याद दिलाती भारत की पहचान बताती संस्कार संस्कृति लाती निज कर्तव्य के पाठ पढ़ाती वह देव वाणी हमारी संस्कृत रहे निशानी । देव से नि:सृत वाणी , है भाषा बड़ी पुरानी , श्रवण मधुर सुहानी , पंडितों की पहिचानी , तो धर ले इसे जुवानी संस्कृत रहे निशानी । यह खो रही है मानी भाई करो नहीं मनमानी फिर रहेगी नहीं निशानी बन जाएगी सदा कहानी तो ले मन में एक ठानी संस्कृत रहे निशानी । - गोपाल पाठक भदसेरी