हे समाज जरा जान !
विधवा नारी विधुर पुरूष को, नहीं मिलता सम्मान । भार धरा सब माने इनको, कब लोगे संज्ञान । गंग स्वरूपा विधवा नारी ब्रह्म पुरूष महान । ये दोनों हैं इसी रूप में, हे समाज ! जरा जान । नहीं करो इनको उपेक्षित, दे नया पहचान। वंदनीय हैं पूज्य रूप में , ले आशीष खजान। शुभ कर्मों से मत कर वंचित , दे प्रथम स्थान। तुम जैसे हो वे भी वैसे , अंतर एक का ज्ञान। नहीं नहीं अंतर मत देखो , देखो एक समान । चर्म रक्त अस्थी जीय दोनों, मानवता को मान । © गोपाल पाठक भदसेरी