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माँ !

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 क्या शक्ति है ! कितनी धनी है ! हर विपरीत में माँ सबसे तनी है । चिथड़े वसन लिपटे हो तन । माँ की आंचल मखमली हर छण । सुखी रोटियाँ नमक भात ,  ली हो माँ अपनी हाथ । पर वह मखन मलाई से कम नहीं , खिलाई हो कोर बांध । तपती चिलचिलाती जेठ की दुपहरी । माँ साथ रहती देती छाया बन कर प्रहरी । वह कड़कड़ाती हाड़ कपाती ठंडी !  पुस माघ की । छाती में चिपका बिन ऊनी वस्त्र माँ ,  लड़ती बाघ सी । हर स्वप्न हर ख्वाहिशें पुरा करने को , जोर लगा देती । नहीं है सामर्थ्य पर चमकता तारा सा , माँ सुन्दर बना देती । हर दुख कष्ट समस्या का हँसते समाधान । माँ सच में तू दुनिया में हर शख्सियत से हो महान ।।                                  - गोपाल पाठक 

सुन लो मेरी पुकार......

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सुन लो मेरी पुकार ! कोई सुन लो मेरी पुकार !! थी कली मैं पिता के आंगन,  अब हूँ मैं ससुराल । रोज दंश यहाँ सहना पड़ता , सदा मिलती फटकार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... बचपन मेरा खेल में गुजरा,  मिलता था घर में प्यार । भाई बहन संग होती ठिठोली,  अब होता तिरस्कार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... हुई जवाँ मैं घर में बड़ी थी,  चर्चा चली विवाह । पिता जी मेरे घर से निकले,  करने वर व्यापार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... कठिन परिश्रम कर एक मिला,  पति परमेश्वर भगवान । पिता हमारे धन कुछ देकर,  कर दिये मुझको दान । कर्मभूमि  को जब मैं आयी,  थोड़ा दिन मिला मान । हुआ आरंभ अब कठोर बचन का,  हर छण ही अपमान । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... समझ नहीं मैं पायी थी,  क्यों मिल रहा अपमान । क्या कमियाँ है मुझमें ऐसी, शुरू हो गया मार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... एक दिन ऐसा समय आ गया,  मिला मुझे जवाब । बाप तेरा नहीं धन दिया है,  क्या करूँ सत्कार । कोई सुन लो मेरी पुकार ......... हे कुलक्षिणी कुलघातनी ! छोड़ यहाँ दरबार । जाओ अपने माई के घर तू...

नेता के वश में है जनता....

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 [ तर्ज -: भगत के बस में हैं भगवान  ] नेता के वश में है जनता  गरीब दुखी बेरोजगार शोषित रहे यही शोभित सुन्दरता ! नेता के वश में है जनता !! नेता सीधी जनता की , रोज गाँव में डोले  जनता को भोली समझे , जनता से आदर बोले कभी वो आता नहीं था, आया चुनाव की बारी  हाथ जोड़े चल आगे , चुनाव तक रहता जारी  भले नहीं कोई काम नाम हो, सब कुछ रहे पता ! नेता के वश में है जनता !! देख नेता की माया , चुनाव जब सर पे आया  आता अब रोजे दर पर , बात कुछ कह भरमाया  तेरा मैं ख्याल रखूँगा ,मरते दम जनता में रहूँगा  वोट हमहीं को देना , तेरा सब काम करूँगा  बड़े बड़े बड़ बोल बोल के , जीतते लापता !  नेता के वश में है जनता !!  जीत कर आता नहीं है , प्रित जनता से नहीं है  कुर्सी से चिपके रहता , कोई परवाह नहीं है  शान शोहरत के आगे , गाड़ी बंगला को पावे कौन जनता को देखे , दुबारा कभी न आवे इस तरह के नेताओं को कैसे हम जीता ? नेता के वश में है जनता !!            -::-                   ...

गणेश वंदना

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   हे गौरी पुत्र गणेश गणपति आओ मैं पूजन करूँ ।    दूँ पान अक्षत फूल चंदन और नीराजन करूँ ।।    तू विघ्ननाशक बुद्धिदाता विद्या मंगल दाता हो ।    प्रभु जो भी आये शरण तेरे वो कृपा फल पाता हो।।   हे नाथ आप अनाथ के तू ख्याल नित ही करते हो ।  जो भक्ति से पूजन करे उसे शक्ति धन धान्य देते हो ।।   हूँ अल्प बुद्धि न्यून शुद्धि कपट छल लोभी भरा ।     नित पाप हो निज कर्म से पूजन को नहीं कभी मन करा।।   प्रभु है सुअवसर सुखद दिन एकदंत आप पधारो घर ।  कर जोड़ कर यही विनती सुन टेर अब कष्टों को हर ।।                                   --::--                                         © गोपाल पाठक 

जनता जनार्दन !

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 जनता जनार्दन!  समझे...?  नहीं.... ? ईश्वर ! भगवान ! ... यानि ;  हम जनता महान ! हाँ!  शब्द सुनो कान  और मने में रहो खुश ; कहना हम जनता महान ! भले रहना अंजान  मूंछ पर हाथ, कहीं भटके न ध्यान ! खोना न पहचान  गरीब ,धुखी ,बेरोजगार , शोषित होकर सुशोभित अलंकृत नाम भगत के बस में हैं भगवान ! " भगत ! " हाँ ! भगत, भक्त  ..... कौन ...?  नेता ....! नेता भक्त नहीं ;  वो हैं भगवान  करते हैं कल्याण चुनाव पर्व में आते द्वार नर्म में आम जनता को कहते हैं ; तू मेरी जान ! तुम्हारे लिए हर पल कुर्बान  चाहे देना पड़े प्राण सबसे पहले तोहर काम  भैया ! ऐसी बोली कौन बोले ? जो हो सामर्थ्यवान धन के खजान  जिनका न हो लगाम  बाहुबली में नाम जो जिये शान गाड़ी बंगला आलीशान और कितना बतायें  नेता ही हमरे महान!  हे भगवान......!  भगत के बस में हैं भगवान! जनता पक्का शंकर भगवान  एक लोटा पानी पर ही  दे देते वरदान ! जनता मंदिर के मूर्ति  दर पर सर झुकाओ ; मनोकामना पूर्ति ! जनता देवी माँ भोली-भाली  वो कहता ; बस एक बार ...

हरा भरा है राँची प्यारा

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हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा । मनमोहक परिदृश्य है सुन्दर देखो दुनिया सारा ।। कर्क रेखा के पास अवस्थित छोटा नाग से दक्षिण स्वर्णरेखा के तट पर बस कर प्रकृति हर पल हर्षित  तरसे नहीं कोई के जी आओ एक दोबारा हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा ।। आर्द्र उप-उष्णकटिबंधीय गर्मी डाले न डेरा हरियाली कर चंचल चितवन करता नया सबेरा  पर्वत विटप सुखद जलावायु गठबंधन अलग नजारा हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा ।। दशम फौल हूंड्रू जल झरना बड़ा अनमोल रतन है बाबा पहाड़ी देउड़ी मंदिर मनोकामना स्थल है  मन विक्षिप्त को कांके देता नव जीवन उजियारा हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा  शहर हमारा ।। मछलीघर ,चिड़ियाघर, कांके डैम बहुत खूब भावे राजभवन का नक्षत्र वन देख उमंग गगन मन छाये  आओ घाटी वादियों में घूमों झूमों घर परिवारा  हरा भरा है राँची प्यारा न्यारा शहर हमारा ।।                            - गोपाल पाठक

जब चुनाव की बारी है

 ये काल बवंडर कैसा उमड़ा अब तक नहीं कोई रोक सका । सरकारें लाचार दिखती नये बयान से रोज पका ।। हिम्मत धर लो हिम्मत धरलो और कितना हिम्मत कर लूँ  । राजनीति की नये घरौंदे में क्या मैं अब घर कर लूँ ।। अग्नि धधक भूख बन कातिल तू किसमें मद मस्त रहा । चीख पीर तो सुनता नहीं तू गरीबी कोई शब्द रहा ।। सुखी रोटियाँ नमक भात भी मिल जाये वह दिन सुखी । इससे ज्यादा क्या आश है दीन हीन बन बैठ दुखी ।। शिक्षा स्वास्थ्य और गरीबी हटानी मेरी जिम्मेबारी है । इस पर अब तू नहीं बोलना जब चुनाव की बारी है ।।                                       © गोपाल पाठक