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राम नाम का शोर

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*जय श्री राम ! जय श्री राम !* राम नाम से चारों दिशायें , गूँजे चारों ओर | राम राम सियाराम राम हो हर घर में हो शोर जब तक गंगा पावन धरती , सूर्य गगन में चमके | तब तक राम नाम की वर्षा , पुरे विश्व में वरसे | नहीं रहे कोई कोना खाली राम नाम को जापे | चाईना हो या अरब देश पाक राम अपनाबे | फिर बना रहेगा अमन शांति , द्वेष नहीं रह पाबे | पुन: हमारा देश जगत में , विश्व गुरू कहलाबे | तो रहना नहीं अब शांत बैठकर , शेर बन दहाड़ें | वन वनराज हो सारी जंता , ऐंठा गीदड़ लताड़ें | जय श्री राम !              - गोपाल पाठक                          भदसेरी

जगदम्बा स्तुति

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नमन चरणों में माँ जगदन्बा तेरी देदो ज्ञान , स्वर कंठ में दे मीठी तान... स्वर कंठ में दे मीठी तान... वाणी करदे विमल शब्द होय सरल काव्य सुन्दर ! यही चाह करूँ माँ हरदम । हम अबोध हैं माँ दे दो बुद्धि हमें सर्व ज्ञान ! स्वर कंठ में दे मीठी तान... स्वर कंठ में दे मीठी तान... अभयदायनी तू वरदायनी तू महामाया ! स्वर अमृत भर जग जाया । कर वेद लिए सुर अमृत दिये गीता ज्ञान ! स्वर कंठ में दे मीठी तान... स्वर कंठ में दे मीठी तान... सिंहवाहिनी तू दुष्ट दामिनी तू महारानी ! एक कृपा की चाह भवानी माता यही विनती ना करूँ गलती जब तक प्राण ! स्वर कंठ में दे मीठी तान... स्वर कंठ में दे मीठी तान...    - गोपाल पाठक         भदसेरी

भगवती स्तुति

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      ।।  भगवती स्तुति  ।।              माँ तेरी चरणों में मेरी विनती  दे दो बुद्धि हमें ना करूँ गलती । मन मान नहीं भटकाव रहे तन शुद्धि नहीं कोई जुड़ाव रहे । बस कृपा की दृष्टि को वृष्टि कर दो माँ शरण में आया हूँ बहु वर दो । मैं पूजा न अर्चन न अर्पण जानूँ नहीं तर्पण समर्पण विसर्जन जानूँ । माँ मुझे नहीं कर्म न धर्म मालूम नहीं शुद्धियता का न मर्म मालूम । कलि काल है जाल विकराल बना मन मोह माया का जंजाल बना । अधर पर न धर कभी नाम तेरा  रसना झूठ खान से भरा मेरा ।  अब तू ही माता उबार करो  सदबुद्धि  सदा सुविचार ही दो । सुनो मेरी मातु करूणा की वचन  दे दो शरण मुझे माँ अपनी चरण । हो जायेंगे धन्य हम धन्य धनी निच अधमी बनेगा अमूल्य मणी ।      - गोपाल पाठक             भदसेरी 

श्री नवरात्र चालीसा

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                ।।  श्री गणेशाय  नम:  ।।                            -:  श्री नवरात्र चालीसा   :-                         !!   दोहा  !!      श्री पद नमन गुरू करूँ , मन तम मोह मिटाय ।       मांँ  शरण में जाऊँ मैं ,  प्रथम गुरू मनाय ।।                       ।।   चौपाई  ।।                                  शैलपुत्री रुप प्रथम है माँ की ।              नवरात्रि की प्रथम दिवस की ।।                           कर   दाएँ   त्रिशूल   धरें   ...

युवा तुम हो किधर.....

युवा तुम हो किधर ? कहाँ है शोर ? रंग चड़ा है ; चुनाव है ; कहीं अपने कामों से तो नहीं भटकाव है ? नहीं ! रैलियाँ है जाना है दम खम दिखाना है और नेता जी संग थोड़ी तस्वीर खिंचवाना है । अच्छा ! तब तो आप बहुत व्यस्त हो हाँ ! नेता जी को जिताना है क्या कुछ लूट खजाना है ? क्या क्या ? भाई इमानदार है समझदार हैं हमें भी लगा कुछ मजेदार है । मतलब ? मतलब नहीं मालूम ठीक है चलता हूँ ? गाड़ी आ रही है खाश आप के लिए ? हाँ हाँ...... तब तो आपकी बहुत पूछ है.. बड़े नेताओं तक पहुँच है... जी ! आप जनता हैं या नेता हैं ? मैं ! मैं जनता जनार्दन का नेता हूँ । पढ़ाई लिखाई काम धंधा खतम हाँ हाँ ये सब में नहीं है दम वाह भाई ! पहले करते थे वैकेन्सी की इंतजार सरकारी रिज़ल्ट में देखते रहते मेरे यार हुआ कैसे तुम्हें राजनीति से प्यार ? ऊब गया था .. परीक्षा देते देते थक गया था... फिर मन में सोंच इसमें जोर जमाया उसके बाद उसके बाद क्या ? देख रहे हो नेताओं से हुआ परिचय शान शोहरत का हुआ संचय फेसबुक में लाईक्स बड़ा वाट्स अप के स्टेटस में व्यूज बड़ा बस ! इतने के लिए तू हुआ फीदा पड़ाई लिख...

" बगिया पुकारता "

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 🌤🌤🌤🌤🌤        🦆🕊 उठ प्यारे बंधुओं , पूर्व हुआ लाल सी । खग वृंद गा रहे , मंगल की गान सी ।              आ रहा वीर आज ,              शेर सा दहाड़ता ।              सो नहीं जाग अब ,              बगिया पुकारता । चुन चुन कली कुसुम , पथ पर बिछाओ । भारती की लाल को , धूली पर न लाओ । 🌸🌼🌸🌼🌸🍁🍂🍃🌻 🌼🌸🌹🌷💐💐🌷🌹🥀 🌺🌸🌼🌻☘🌿🍁🍂🥀 🥀🌹🌷💐🌺🌸🌼🌺🌸                 छाल तल लहू बून्द ,                 लाल सुकुमार की ।                 पोछूँ चाटूँ पग तल ,                 मैं शेरशाह की ।               👏👏👏👏👏👏👏 धन्य बन जाऊँ आज , वीर विराट से । दुश्मन के धूल चटा , वह सम्राट से ।     ...
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हृदय आनंदित हर्ष हुआ है नयनो का आनंद हुआ है मोदी जी जो किया आपने वैसा नहीं कोई कर्म किया है स्वच्छ  सिपाही का मान बढ़ा कर्मों का अरमान बढ़ा जो देखा दृश्य मैं समाचार में कहने को न शब्द गढ़ा । क्या कहूँ  क्या नया शब्द में अभी नवोदित हूँ निशब्द में जो दिखलाया आज आपने कभी नहीं कोई करे लब्ध में । पर एक विनय तुमसे मेरी अब बदला में न कर देरी जो खून खेला है दुश्मन ने तू बिगुल बजा दो रणभेरी । फिर देखो तांडव अपना रणचंडी कर मूंडी चखना अमर शौर्य की अमर वाणी गूंजेगा बलिदानी अंगना । तब तृप्त रहेंगे अमर वीर जो गये स्वर्ग मेघों के चीर लहू लाल जब पाकिस्ता देख उनकी आत्मा रहे न पीर ।     - गोपाल पाठक            भदसेरी