कविता संग्रह

Friday, February 15, 2019

हे अमर जवान !

शेर बन कैसे सोये हो ?
मांद निकल तू बाहर आ ।
कुत्ते करता रोज गलतियाँ,
धड़ से सिर अलग कर आ ।

बहुत हो चुका नम्र दिखाना,
भारत माँ के वीर जवान ।
दे जबाब अब नहीं सहो तू ,
जब भी वार करे शैतान ।

फहरादो लाहौर तिरंगा  ,
पेशावर नहीं रहे निशान ।
नाम मिटादो मान चित्र से ,
वीर सपुत हे अमर जवान !

जय हिन्द !
जय जवान !

   - गोपाल पाठक
         भदसेरी 

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