कविता संग्रह

Friday, February 15, 2019

सिंहासन अब भी नहीं डोला

सिंहासन अब भी नहीं डोला
कायर कहने को मन बोला
अब तो सेनाओं पर छोड़ो ,
"कड़ी निंदा करता हूँ " ये मत बोलो
कल तो बोल दिये थे आप
आज सुनेगा कौन प्रलाप
किसी का गोद किसी का मांग
सुना किया, सीमा अब लांघ
नहीं रोकड़े नहीं ठोकरें
हाफीज को तू करो चिथड़े
रक्त चंडिका जाग चुकी है
खप्पर वाली आ चुकी है
नेताओं मत कर व्यापार
इसमें खलल नहीं मत डाल

      - गोपाल पाठक
              भदसेरी 

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