कविता संग्रह

Wednesday, February 13, 2019

संस्कृत रहे निशानी

असली सभ्यता याद दिलाती
भारत की पहचान बताती 
संस्कार संस्कृति लाती
निज कर्तव्य के पाठ पढ़ाती
वह देव वाणी हमारी
संस्कृत रहे निशानी ।

देव से नि:सृत वाणी ,
है भाषा बड़ी पुरानी ,
श्रवण मधुर सुहानी ,
पंडितों की पहिचानी ,
तो धर ले इसे जुवानी
संस्कृत रहे निशानी ।
यह खो रही है मानी
भाई करो नहीं मनमानी
फिर रहेगी नहीं निशानी
बन जाएगी सदा कहानी
तो ले मन में एक ठानी
संस्कृत रहे निशानी ।

     - गोपाल पाठक
            भदसेरी

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